‘मंदिर भी हमारा मस्जिद भी हमारा कहीं पे राम लिख दो कहीं पे रहमान’ ये पंक्ति शिवजी पंजियार और जब्बार दरजी के लिए ही बना हुआ लगता है |
जिदंगी के हर खट्ठे-मीठे पलों के बीच दोस्ती हमेशा सबसे ऊपर रहती है। भारत के आजाद होने से पहले हिंदू-मुस्लिम भाईचारे और एकता की मिसाल कायम कर चुके बिहार के सीतामढ़ी स्थित चोरौत गाँव के दो दोस्तों शिवजी पंजियार और जब्बार दरजी की दोस्ती को 75 साल से भी ज्यादा समय बीत चुका है।
आज इनकी दोस्ती चोरौत प्रखंड के लोगों के लिए मिसाल बनी हुई है। चोरौत प्रखंड में रहने वाले शिवजी पंजियार और जब्बार दरजी की दोस्ती की आज हर कोई चर्चा करता है।
जब्बार बताते हैं कि 1941 में उनके पिता किसान थे। जबकि उनके दोस्त शिवजी पंजियार के पिता जमींदार थे। और उनकी ये दोस्ती अटूट है, हमदोनों एकदूसरे के सलाह-मशविरा लिए बिना कोई काम या फैसला नहीं करते है |
जब शिवजी पजियार और जब्बार दरजी 9 वर्ष के थे तब से ही उनकी ये दोस्ती है, दोनों अपने नियत समय में मंदिर और मस्जिद जाते है और एक दुसरे के लिए दुआ करते है, ईद हो या राम नवमी दोनो साथ में मनाते है |

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